Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi PDF Download

पहचान


    • पेड़ के ऊपर चढ़ा आदमी
    • ऊंचा दिखाई देता है।
    • जड़ में खड़ा आदमी
    • नीचा दिखाई देता है।
    • आदमी न ऊंचा होता है, न नीचा होता है,
    • न बड़ा होता है, न छोटा होता है।
    • आदमी सिर्फ आदमी होता है।
    • पता नहीं, इस सीधे-सपाट सत्य को
    • दुनिया क्यों नहीं जानती है?
    • और अगर जानती है,
    • तो मन से क्यों नहीं मानती
    • इससे फर्क नहीं पड़ता
    • कि आदमी कहां खड़ा है?
    • पथ पर या रथ पर?
    • तीर पर या प्राचीर पर?
    • फर्क इससे पड़ता है कि जहां खड़ा है,
    • या जहां उसे खड़ा होना पड़ा है,
    • वहां उसका धरातल क्या है?
    • हिमालय की चोटी पर पहुंच,
    • एवरेस्ट-विजय की पताका फहरा,
    • कोई विजेता यदि ईर्ष्या से दग्ध
    • अपने साथी से विश्वासघात करे,
    • तो उसका क्या अपराध
    • इसलिए क्षम्य हो जाएगा कि
    • वह एवरेस्ट की ऊंचाई पर हुआ था?
    • नहीं, अपराध अपराध ही रहेगा,
    • हिमालय की सारी धवलता
    • उस कालिमा को नहीं ढ़क सकती।
    • कपड़ों की दुधिया सफेदी जैसे
    • मन की मलिनता को नहीं छिपा सकती।
    • किसी संत कवि ने कहा है कि
    • मनुष्य के ऊपर कोई नहीं होता,
    • मुझे लगता है कि मनुष्य के ऊपर
    • उसका मन होता है।
    • छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता,
    • टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।
    • इसीलिए तो भगवान कृष्ण को
    • शस्त्रों से सज्ज, रथ पर चढ़े,
    • कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े,
    • अर्जुन को गीता सुनानी पड़ी थी।
    • मन हारकर, मैदान नहीं जीते जाते,
    • न मैदान जीतने से मन ही जीते जाते हैं।
    • चोटी से गिरने से
    • अधिक चोट लगती है।
    • अस्थि जुड़ जाती,
    • पीड़ा मन में सुलगती है।
    • इसका अर्थ यह नहीं कि
    • चोटी पर चढ़ने की चुनौती ही न माने,
    • इसका अर्थ यह भी नहीं कि
    • परिस्थिति पर विजय पाने की न ठानें।
    • आदमी जहां है, वही खड़ा रहे?
    • दूसरों की दया के भरोसे पर पड़ा रहे?
    • जड़ता का नाम जीवन नहीं है,
    • पलायन पुरोगमन नहीं है।
    • आदमी को चाहिए कि वह जूझे
    • परिस्थितियों से लड़े,
    • एक स्वप्न टूटे तो दूसरा गढ़े।
    • किंतु कितना भी ऊंचा उठे,
    • मनुष्यता के स्तर से न गिरे,
    • अपने धरातल को न छोड़े,
    • अंतर्यामी से मुंह न मोड़े।
    • एक पांव धरती पर रखकर ही
    • वामन भगवान ने आकाश-पाताल को जीता था।
    • धरती ही धारण करती है,
    • कोई इस पर भार न बने,
    • मिथ्या अभियान से न तने।
    • आदमी की पहचान,
    • उसके धन या आसन से नहीं होती,
    • उसके मन से होती है।
    • मन की फकीरी पर
    • कुबेर की संपदा भी रोती है।

अटल बिहारी वाजपेयी 
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